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Sunday, October 5, 2025

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस, 2025

सामाजिक न्‍याय एवं अधिकारिता मंत्रालय//अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस प्रविष्टि तिथि: 05 October 2025 at 5:53 PM by PIB Delhi

वरिष्ठ नागरिकों द्वारा अनुभव भी सांझा किए जाएंगे 

नई दिल्ली: 05 अक्टूबर 2025: (पीआईबी//जन स्क्रीन)::

Pexels-Photo-By Kindel Media

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग (डीओएसजेई) 6 अक्टूबर, 2025 को मानस भवन, जबलपुर में छावनी बोर्ड, रक्षा मंत्रालय और मध्य प्रदेश सरकार के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस, 2025 मनाना जारी रखेगा।

इस कार्यक्रम में केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेन्द्र कुमार, मध्य प्रदेश के पीडब्ल्यूडी मंत्री श्री राकेश सिंह, मध्य प्रदेश के सामाजिक न्याय एवं दिव्यांग कल्याण विभाग मंत्री श्री नारायण सिंह कुशवाह, लोकसभा सांसद श्री आशीष दुबे, राज्यसभा सांसद सुश्री सुमित्रा बाल्मीक और विधायक श्री अभिलाष पांडे सहित कई प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहेंगे।

प्रमुख कार्यक्रम:

स्वामी विवेकानंद मॉडल हाई स्कूल, कटंगा, जबलपुर के विद्यार्थियों द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, जिनमें बुजुर्गों के प्रति सम्मान और भारत की सांस्कृतिक विरासत प्रदर्शित की जाएगी।

अश्मिता ग्रुप (एनएसडी) द्वारा नुक्कड़ नाटक, वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान और अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाएगा।

वरिष्ठ नागरिकों के योगदान के लिए उन्हें सम्मानित करने हेतु सम्मान समारोह।

वरिष्ठ नागरिकों द्वारा अनुभव साझा करना।

1 अक्टूबर 2025 को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाने के लिए आयोजित प्रतियोगिताओं के विजेता छात्रों को पुरस्कार वितरण।

संकल्-माननीय केन्द्रीय मंत्री द्वारा दिलाई गई शपथ, जिसमें वृद्धों की देखभाल के प्रति सामूहिक ज़िम्मेदारी की पुष्टि की गई।

वॉकाथन-हमारे वरिष्ठ नागरिकों के लिए अंतर-पीढ़ीगत जुड़ाव, देखभाल और सम्मान का संदेश फैलाने के लिएद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार की साझेदारी से आयोजित इन कार्यक्रमों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में किए जा रहे प्रतिबद्ध प्रयासों को प्रदर्शित किया जाएगा।

*****//पीके/केसी/केपी/ डीके//(रिलीज़ आईडी: 2175115)

Monday, August 1, 2022

चुनौतियों से भरी 70 साल की आजादी

Posted On: 15 AUG 2017 10:07AM

स्वतंत्रता के 70 वर्ष//विशेष लेख- स्वतंत्रता दिवस 2017//*अनिल चमड़िया

अनिल चमड़िया एक जानेमाने जन पत्रकार हैं। जन सरोकारों और जन मीडिया से जुड़े हुए भी हैं। संवाददाताओं से विज्ञापन एकत्र करवाने जैसे मामलों को बुलंदी से उठाने वाले अनिल चमड़िया पंजाब में भी आते रहे हैं। सेमिनारों में भी शामिल होते रहे हैं। उनकी बात में ज़ोरदार तर्क होता है। उनका यह आलेख कुछ पुराना है। यह 15 अगस्त 2017 का लिखा हुआ है लेकिन इसमें उठाई गई बातें आज भी प्रासंगिक हैं। पढ़िए पूरा लेख:रेक्टर कथूरिया 

नई दिल्ली: 15 अगस्त 2017: (अनिल चमड़िया//पीआईबी)::

ब्रिटिश हुकूमत का मतलब क्या था ये उस समय के आंदोलन के इतिहास के एक अंश से समझा जा सकता है। महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में लिखा“ हमें अनुभव होता हो या न होता हो, कुछ दिन से हम पर एक प्रकार का फौजी शासन हो रहा है। फौजों का शासन आखिर है क्या? यही कि सैनिक अफसर की मर्जी ही कानून बन जाती है और वह चाहे साधारण कानून को ताक पर रखकर विशेष आज्ञायें लाद देता है और जनता बेचारी में उनके विरोध करने का दम नहीं होता, पर मैं आशा करता हूं, वे दिन जाते रहे कि अंग्रेज शासकों के फरमानों के आगे हम चुपचाप सिर झुका दें  ”

70 वर्ष पहले ब्रिटिश साम्राज्य में भारतीय जनता के हालात को समझने और उसके खिलाफ संघर्ष को याद करना किसी स्कूली पाठ्यक्रम को पढ़कर परीक्षा में पास करने की एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। उसे महसूस करना ही पाठ्यक्रम के उद्देश्यों को पूरा करता है। पूरी दुनिया में मानव सभ्यता के भीतर उन तमाम तरह की बुराईयों के खिलाफ संघर्ष होता रहा है जब इंसानी हक हकूक को शासक होने के नाते कोई अपने मातहत करने की कोशिश करता है।उन संघर्षों को नई पीढ़ी को महसूस करना होता है ताकि वह इंसानी हक हकूक को लेकर बराबर संवेदनशील रहे और अपने हासिल किये अधिकारों के प्रति चौकन्ना रहें। यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। 70 वर्षों की आजादी के मूल्यांकन की यह कसौटी हो सकती कि मौजूदा पीढ़ी को संघर्ष की वह विरासत के रूप में मिली है।

नई पीढ़ी के सामने दस्तावेज के रूप में एक संविधान है। अंग्रेजों के शासन को समाप्त करने के लिए सब लोग एकमत हुए तो इस संकल्प के साथ कि भविष्य को हम अपने तरीके से मिल जुलकर संचालित करेंगे। इसीलिए सत्ता हस्तानांतरण के बाद हमने अपने संविधान में पहला वाक्य यही लिखा कि हम भारत के लोग अब बराबरी,सम्मान और भाईचारे वाला समाज बनाने के लिए यात्रा शुरु कर रहे हैं।उस समय की हमारी स्थिति का आकलन डॉ. अम्बेडकर के इस कथन से किया जा सकता है: ‘‘26, जनवरी 1950 को हमलोग विसंगति से भरे हुए जीवन में प्रवेश करने वाले हैं। राजनीतिक दृष्टि से अपने पास समता रहेगी( यानी अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए एक वोट देने का अधिकार रहेगा),पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता रहेगी। आगे कहते है कि ऐसी विसंगति भरा जीवन हम लोग कब तक जिएंगे? अपने सामाजिक व आर्थिक जीवन में हम कब तक समता को नकारेंगे? यदि लंबे समय तक हम उसे नकारते रहें, तो अपने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल लेंगे। इस विसंगति को यथाशीघ्र दूर करना चाहिए। वे चेतावनी देते हैं कि नहीं तो विषमता के शिकार लोग उसमें सुरंग लगा देंगे।’

पूरी दुनिया में कई देशों को ब्रिटिश साम्राज्य से उस समय आजादी मिली। सभी देश अपने अपने तरीके से उस आजादी का मूल्यांकन कर रहे हैं। हमारे देश में भी ये मूल्यांकन किया जा रहा है। 70 वर्षों में हमने अपने संकल्प को किस हद तक पूरा किया है।लेकिन उससे पहले हमें ये समझना होगा कि आखिर संविधान में जो संकल्प लिया गय़ा उसके सामने किस तरह की चुनौती रही है।26 नवम्बर 1949 को डॉ. अम्बेडकर संविधान सभा के समक्ष कहते हैं: ‘‘सामाजिक व मानस शास्त्रीय अर्थ में हम एक राष्ट्र नहीं हैं, यह जितनी जल्दी हमारे ध्यान में आ जाएगा, हमारे लिए उतना हितकर होगा..जातियां सामाजिक जीवन में परस्पर द्वेष और विलगाव का निर्माण करती हैं। इसलिए जाति राष्ट्र विरोधी होती है। लेकिन हमें एक राष्ट्र बनना हो तो इस सारी कठिनाइयों पर जीत हासिल करनी होगी; क्योंकि जब एक राष्ट्र होगा, तभी बंधुता की भावना आकार ले सकती है। बंधुता यानी भाईचारे के बिना बराबरी व स्वतंत्रता केवल ऊपरी दिखावा मात्र रहेगी।’

70 वर्षों तक की यह यात्रा हमें सभी मोर्चे पर एक जैसी राय बनाने से रोकती है। हम ये दावा नहीं कर सकते हैं कि हमने अपने संकल्प पूरे कर लिये हैं।यानी सत्ता हस्तानांतरण के बाद पुराने ढांचे की विकृतियां व प्रवृतियां बनी हुई है। दरअसल उपनिवेशवाद के दौर से निकले देशों के सामने तीन तरह की चुनौती रही है। एक चुनौती तो उस ढांचे के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक ढांचे के अवेशषों को खत्म करने की जिस ढांचे को चुनौती देकर आजाद होने का दावा किया जाता है। दूसरी चुनौती उस सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे के अवशेषों को समाप्त करने की जिनकी वजह से हमें गुलामी का शिकार होना पड़ा। और तीसरी चुनौती एक नये समाज की परिकल्पना कर उसे पूरा करने के लिए नीतियां बनाना और उनके आधार पर कार्यक्रमों को निर्धारित करना। हमारे देश में तीनों स्तरों पर संघर्ष की प्रक्रिया विभिन्न स्तरों पर चलती रही है। सरकार अपने स्तर पर कोशिशों को अंजाम देती रही है तो दूसरी तरफ विविधता वाले समाज का हर हिस्सा अपने अपने स्तर पर उन चुनौतियों से जूझता रहा है। डा. अम्बेडकर ने इसे ही कठिनाईयों पर जीत के रूप में व्यक्त किया है।

दरअसल हम जब 70 वर्ष की आजादी की बात कर रहे हैं तो इसका मकसद इस बात पर जोर देना भी है कि हमें अपनी चुनौतियों का मुकाबला करने की गति को तीव्र करना चाहिए। कोई वरिष्ठ नागरिक यदि कहते हुए हमारे आसपास मिलता है कि हमने सचमुच आजादी की सांसें लेकर अपने जीवन की यह यात्रा पूरी की है तो समझना चाहिए कि सचमुच हमारी आजादी दुनिया के दूसरे देशों के सामने एक मिसाल के रूप में स्थापित है। (PIB)

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*लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।

वीएल/डीएस/एसएस/एजे-139

Tuesday, September 2, 2014

नितिन गडकरी ने मनरेगा में किए अभूतपूर्व बदलाव

02-सितम्बर-2014 19:44 IST
श्रमिकों में से 50 फीसदी को नहरों के काम में लगाया जाएगा
केंद्रीय खाद्य प्रसंस्‍करण मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल 02 सितंबर, 2014 को नई दिल्‍ली में केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग और शिपिंग मंत्री श्री नितिन गडकरी से मुलाकात करते हुए। (पसूका-हिंदी इकाई)
The Union Minister for Food Processing Industries, Smt. Harsimrat Kaur Badal meeting the Union Minister for Road Transport & Highways and Shipping, Shri Nitin Gadkari, in New Delhi on September 02, 2014.
गंभीर सूखे और सूखे जैसे हालात या अभाव से निपटने के लिए, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी ने आदेश दिया है कि जिला स्तर पर एजेंसीज द्वारा लिए जाने वाले श्रमिकों में से 50 फीसदी को चेक डेम संरक्षण, पारंपरिक जल स्रोतों, छोटे तालाबों और नहरों से गाद निकालने के काम में लगाया जाएगा। यह निर्णय संदस सदस्यों और स्थानीय जन प्रतिनिधियों द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को भ्रष्टाचार का गढ़ कहे जाने के बाद लिया गया। मनरेगा के बारे में कहा जाने लगा था कि इस ग्रामीण रोजगार योजना से किसी प्रकार की उत्पादक संपत्ति का निर्माण नहीं हो रहा है।

एक प्रेस विज्ञप्ति‍ के जरिए मंत्री ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार के कार्यों के लिए दिहाड़ी श्रमिकों और मशीनरी के संयोजन की आवश्यक होती है। इसमें कुशल घटकों की भागीदारी 49 फीसदी तक बढ़ गई है। कुशल भागीदारी को 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत किए जाने का प्रावधान राज्यों को अधिकार संपन्न बनाता है। यदि वे चाहें तो चेक डेम, छोटे सिंचाई तालाबों का काम मशीन से कर सकते हैं और बाकी 51फीसदी का भुगतान वो दिहाड़ी मजदूरी के रुप में कर सकते है।

मंत्री ने आगे कहा कि यदि राज्य कुशल भाग को 40 फीसदी तक सीमित रखना चाहते हैं तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। संसद सदस्यों और जल संरक्षण से जुड़े राजेंद्र सिंह और पोपट राव पंवार जैसे गैर सरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने इन बदलावों का स्वागत किया है। उनका कहना है कि मनरेगा में इस प्रकार के बदलावों के जरिए जल संरक्षण के लिए ढ़ांचा विकसित होगा जो सूखे और जल संकट से निपटने में मदद करेगा।

मंत्री ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को निर्देश दिया है कि राज्य सरकारों को किए जाने वाले सभी कोष हस्तांत्रण ई-पेमेंट प्लेटफॉर्म के जरिए समय से किए जाएं जिससे कि मजदूरी के भुगतान में एक सप्ताह से अधिक की देरी नहीं हो। (PIB)

विजयलक्ष्मी कासोटिया/एएम/एनए-3473

Thursday, August 15, 2013

प्रधानमन्त्री के सम्बोधन में रहा अतीत से अब तक का लेखाजोखा

15-अगस्त-2013 08:42 IST
आज यकीनन ही खुशी का दिन लेकिन दिलों में दर्द भी है
15 अगस्त 2013  को 67 वें स्वतन्त्रता दिवस पर लाल किले के सामने कुछ इस तरह का दृश्य था 


लाल किले की ऐतिहासिक प्राचीर से जय हिन्द का जय घोष करते प्रधानमन्त्री डाक्टर मनमोहन सिंह 
आज प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने स्‍वतंत्रता दि‍वस 2013 के अवसर पर लाल कि‍ले के प्राचीर से देश को संबोधि‍त कि‍या । इस अवसर पर प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ इस प्रकार है - 

“मेरे प्यारे भारतवासियो, 

भाइयो-बहनो और प्यारे बच्चो, 

मैं आप सभी को इस स्वाधीनता दिवस पर बधाई देता हूँ। 

आज यकीनन ही खुशी का दिन है। लेकिन आज़ादी के इस त्यौहार पर हमारे दिलों में इस बात का दर्द भी है कि उत्तराखण्ड के हमारे भाई-बहनों को करीब दो महीने पहले भारी तबाही का सामना करना पड़ा। हमारी संवेदना और सहानुभूति उन सभी परिवारों के साथ है जिनको जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा । मैं आज उत्तराखण्ड की जनता को यह भरोसा दिलाना चाहता हूं कि इस मुश्किल की घड़ी में सारा देश उनके साथ है। हमारी सरकार जल्द से जल्द लोगों के उजड़े हुए घर दोबारा बसाने और बर्बाद हुए Infrastructure को फिर से बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत से काम कर रही है। 

उत्तराखण्ड में कठिन परिस्थितियों में हमारी फौज़, अर्धसैनिक बलों और केन्द्र और राज्य सरकार के तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों ने आम लोगों के साथ मिलकर, घिरे हुए लोगों को राहत पहुंचाने का जो काम किया, वह तारीफ के काबिल है। हम ख़ास तौर पर Air Force, ITBP और NDRF के उन अधिकारियों और जवानों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने दूसरों को बचाने में अपनी जान कुर्बान कर दी। 

हमें इस बात का भी बेहद अफसोस है कि कल एक दुर्घटना में हमने अपनी पनडुब्बी INS Sindhurakshak को खो दिया। इस हादसे में 18 बहादुर नौसैनिकों के शहीद होने की आशंका है। यह नुकसान इसलिए और भी दर्दनाक है क्योंकि अभी हाल में हमारी Navy ने अपनी पहली Nuclear पनडुब्बी Arihant और Aircraft Carrier, INS Vikrant के रूप में दो बड़ी कामयाबियां हासिल की थीं। 

हम शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं। साथ-साथ Navy की सफलताओं के लिए उन्हें मुबारकबाद भी देते हैं। 

भाइयो और बहनो, 

1947 में महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में हमने आज़ादी हासिल की। उसके बाद के अपने सफर पर अगर हम ग़ौर करें तो पाएंगे कि हर दस साल पर हमारे देश में बड़े बदलाव आए हैं।

1950 के दशक में पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के नेतृत्व में एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में भारत ने अपने पहले कदम रखे। देश में Atomic Energy Commission, योजना आयोग और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं की स्थापना की गई जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्र निर्माण के काम में बहुत बड़ा योगदान दिया। पहली बार आम चुनाव कराए गए और देश के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए पहली पंचवर्षीय योजना बनाने का सिलसिला शुरू किया गया। 

1960 के दशक में पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने नए-नए उद्योग और कारखाने लगवाए, नई सिंचाई परियोजनाएं शुरू की और नए विश्वविद्यालय खोले। राष्ट्र निर्माण में विज्ञान और Technology के महत्व पर ज़ोर देकर उन्होंने इस प्राचीन देश को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में विकसित करने का काम शुरू किया। 

1970 के दशक में इंदिरा जी ने हमारे राष्ट्र का आत्मविश्वास बढ़ाया। इस दौरान हमने अंतरिक्ष में अपना पहला उपग्रह छोड़ा। हरित क्रांति ने पहली बार हमें अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्रदान की। 

राजीव गांधी जी ने अगले दशक में तकनीकी और आर्थिक आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू की। इस दौरान Information Technology के क्षेत्र में हमारी प्रगति की नींव रखी गई। 

पंचायती राज संस्थाओं के महत्व पर ज़ोर दिया गया जिसकी वजह से आगे चलकर इन संस्थाओं को मज़बूत और अधिकार संपन्न बनाने के लिए हमारे संविधान में संशोधन हुआ। 

साल 1991 में हमने श्री नरसिम्हा राव जी के नेतृत्व में एक बहुत बड़े आर्थिक संकट का सामना बख़ूबी किया और देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के लिए आर्थिक सुधारों को अपनाया। उस समय इन सुधारों का कई राजनैतिक दलों ने विरोध किया। लेकिन ये सुधार राष्ट्र हित में थे और इसीलिए बाद में आने वाली सभी सरकारों ने उनको जारी रखा। साल 1991 से लेकर आज तक सुधारों की ये प्रक्रिया आगे बढ़ती रही है। 

भाइयो और बहनो, 

मेरा मानना है कि पिछला दशक भी हमारे देश के इतिहास में बहुत बड़े बदलावों का दशक रहा है। देश की आर्थिक समृद्धि जितनी इस दशक में बढ़ी है उतनी पहले किसी दशक में नहीं बढ़ी। लोकतांत्रिक ताकतों को बढ़ावा मिला है और समाज के बहुत से वर्ग विकास की प्रक्रिया से पहली बार जुड़े हैं। आम आदमी को नए अधिकार मिले हैं जिनकी बदौलत उसकी सामाजिक और आर्थिक ताकत बढ़ी है। 

भाइयो और बहनो, 

मई 2004 में पहली UPA सरकार सत्ता में आई थी। तब से लेकर आज तक हमने एक प्रगतिशील और आधुनिक भारत बनाने के लिए लगन और ईमानदारी से काम किया है। 

हमने एक खुशहाल भारत की कल्पना की है। एक ऐसा भारत जो सदियों से चले आ रहे गरीबी, भूख और बीमारी के बोझ से मुक्ति पा चुका हो। जहाँ शिक्षा के उजाले से अज्ञानता और अंधविश्वास के अंधेरे दूर हो चुके हों। 

जहां सामाजिक समानता हो और सबको एक जैसे आर्थिक अवसर प्राप्त हों। जहाँ समाज के किसी भी तबके को अन्याय और शोषण का सामना न करना पड़े। 

हमने एक ऐसे भारत का सपना देखा है जहाँ नौजवानों को रोज़गार के ऐसे अवसर मिलें जिनके जरिए वह राष्ट्र निर्माण के महान काम में योगदान कर सकें। 

हमने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आवाज़ बुलंद करनी चाही है। हमने एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहा है जिसे सारी दुनिया आदर और सम्मान के साथ देखे। 

इन सपनों को साकार करने के लिए हमने कई कदम उठाए हैं। लेकिन सफर लंबा है, अभी बहुत फासला और तय करना है। 

भाइयो और बहनों, 

अभी कुछ दिन पहले हमने Food Security कानून बनाने की दिशा में एक Ordinance जारी किया है। Food Security Bill अब संसद के सामने है और हमें उम्मीद है यह जल्द ही पास हो जाएगा। इस कानून का फायदा हमारे गांवों की 75 प्रतिशत और शहरों की आधी आबादी को पहुंचेगा। इसके तहत 81 करोड़ भारतीयों को 3 रुपये प्रति किलो चावल, 2 रुपये प्रति किलो गेहूं और 1 रुपये प्रति किलो मोटा अनाज मिल पाएगा। यह दुनिया भर में इस तरह का सबसे बड़ा प्रयास है। 

हम अपने किसानों की मेहनत की वजह से ही इस कानून को लागू कर पाए हैं। साल 2011-12 में हमारी अनाज पैदावार 25.9 करोड़ टन रही, जो एक रिकार्ड है। 

बिना तेज़ कृषि विकास के हम अपने गांवों में खुशहाली पहुंचाने का मक़सद हासिल नहीं कर सकते हैं। पैदावार बढ़ाने और किसानों को उनकी फसल का बेहतर मूल्य दिलवाने के लिए हमने लगातार कोशिशें की है। फसलों के खरीद मूल्यों में पिछले 9 सालों में पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ोत्तरी की गई है। गेहूं और धान के खरीद मूल्य दुगुने से भी अधिक किए गए हैं। कई ऐसे राज्यों में जहां पहले अनाज की कमी रहती थी आज उनकी अपनी ज़रूरत से ज़्यादा पैदावार हो रही है। 

11 वीं पंच-वर्षीय योजना के दौरान कृषि विकास की औसत सालाना दर 3.6 प्रतिशत रही है जो 9वीं और 10वीं योजना, दोनों से ज्यादा है। 

अब ग्रामीण इलाकों में खुशहाली बढ़ने के साफ संकेत दिखाई देने लगे हैं। साल 2004 से लेकर 2011 तक प्रतिव्यक्ति उपभोग किया जा रहा सामान और सुविधाएं पहले के मुकाबले चार गुना तेजी से बढ़े हैं। 

ग्रामीण मजदूरी दर में भी कहीं अधिक तेजी से वृद्धि हुई है। मनरेगा की बदौलत ग्रामीण क्षेत्रों में करोड़ों गरीब लोगों को रोज़गार मिल रहा है। 

गरीबी को नापना एक मुश्किल काम है। गरीबी की परिभाषा को लेकर लोगों के अलग-अलग मत हैं। लेकिन हम गरीबी की चाहे कोई भी परिभाषा अपनाएं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 2004 के बाद गरीबी कम होने की गति तेज़ हुई है। 

कई ऐसे राज्य, जो बहुत समय से पिछड़े माने जाते थे और जिनमें से कुछ को "बीमारू" कहा जाता था, आज तेज़ी से विकास कर रहे हैं। 

भारत में हर बच्चे को शिक्षा के अवसर देने के लिए हमने शिक्षा का अधिकार कानून बनाया है। आज देश में लगभग सभी बच्चे प्राथमिक स्कूलों में पढ़ रहे हैं। 

कॉलेज जाने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या पिछले नौ सालों में दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है। गरीबों और कमजोर तबकों के बच्चों को शिक्षा के अवसरों का फायदा दिलाने के लिए हमने बड़े पैमाने पर वज़ीफों के कार्यक्रम शुरू किए हैं। आज देश भर में 2 करोड़ से ज़्यादा बच्चों को केन्द्र सरकार द्वारा वज़ीफे दिए जा रहे हैं। 

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई नए संस्थान खोले गए हैं। जैसे 8 नए IIT, 7 नए IIM, 16 नई Central Universities और 10 नए NIT । Scientific Research को बढ़ावा देने के लिए भी नई संस्थाएं खोली गई हैं। Science की पढ़ाई में ज्यादा छात्रों को शामिल करने के लिए और विदेशों से भारतीय Scientists की वापसी आसान करने के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। 

लेकिन शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। बहुत सारे स्कूलों में अभी भी पीने का साफ पानी, शौचालय और अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। शिक्षा की Quality को बेहतर बनाने की ज़रूरत है। इसके लिए अध्यापकों की training पर ज़्यादा जोर दिया जाना आवश्यक है। 

Mid-day-Meal योजना में रोज करीब 11 करोड़ बच्चों को स्कूलों में दोपहर का खाना दिया जा रहा है। यह योजना बच्चों की पढ़ाई और पोषण दोनों के लिए बहुत फायदेमंद है। लेकिन इसको बेहतर तरह से लागू करना भी बहुत ज़रूरी है। बिहार में पिछले दिनों जो दर्दनाक हादसा हुआ वह देश में कहीं भी दोबारा नहीं होना चाहिए। 

2005 में हमने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरूआत की थी। इस मिशन के अच्छे परिणाम सामने आने लगे हैं। देश में Maternal Mortality Rate और Infant Mortality Rate दोनों तेज़ी से घटे हैं। पहले से कहीं अधिक बच्चों का जन्म आज अस्पतालों में होता है। टीकाकरण के प्रतिशत में भी काफी वृद्धि हुई है। 

पिछले दो सालों से हमारे देश में पोलियो का कोई भी केस सामने नहीं आया है। हमें एक ऐसे रोग को मिटाने में कामयाबी मिली है जो लाखों लोगों को अपंग बना दिया करता था। 

हमारे ग़रीब भाई-बहनों को अस्पतालों में इलाज के लिए मुफ्त बीमा सुविधा प्रदान कराने वाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना अब साढ़े तीन करोड़ परिवारों को फायदा पहुंचा रही है। 

हमने शहरी क्षेत्रों में भी Health Mission लागू किया है जिससे इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा और उनमें सुधार आएगा। 

महिलाओं की सुरक्षा को बेहतर करने के लिए, हमने महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित कानून को मज़बूत बनाया है। 

Infrastructure यानि सड़कों, रेलगाड़ी, बिजली उत्पादन, Civil Aviation, बंदरगाहों और Telecom जैसे क्षेत्रों में भी पिछले 9 सालों में काफी तरक्की हुई है। गांवों को जोड़ने वाली प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 2 लाख किलोमीटर नई सड़कें बनाई गई हैं। सैंतीस हजार Kilometer से ज़्यादा नए Highway बनाए गए हैं जिनसे व्यापार और यात्रा अब ज़्यादा आसान हो गए हैं। चालीस से ज़्यादा हवाई अड्डों का निर्माण या नवीनीकरण किया गया है। सन् 2004 में सिर्फ 7 प्रतिशत लागों के पास telephone connection थे। आज 73 प्रतिशत लोगों को यह सुविधा प्राप्त है। ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत 2 से बढ़कर 40 हो गया है। बिजली उत्पादन में रिकार्ड बढ़ोत्तरी हुई है। 

भाइयो और बहनो, 

हाल के महीनों में भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में यह बात चर्चा में रही है कि पिछले साल हमारी विकास दर कम होकर 5% रह गई है। यह बात सच है और हम इस हालत में सुधार लाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सिर्फ हमारा देश ही अकेला आर्थिक कठिनाईयों का सामना नहीं कर रहा है। पूरी विश्व अर्थव्यवस्था के लिए पिछला साल मुश्किल भरा रहा है। यूरोप के बड़े देशों में इस वक्त मंदी चल रही है। दुनिया भर में हर जगह निर्यात बाज़ारों की स्थिति में गिरावट आई है। सभी विकासशील देशों को मंदी का सामना करना पड़ा है। 

मेरा मानना है कि भारत में धीमे विकास का दौर बहुत दिन नहीं चलेगा। पिछले 9 सालों में हमारी अर्थव्यवस्था में औसतन 7.9 प्रतिशत सालाना की बढ़ोत्तरी हुई है। विकास की यह रफ्तार अब तक किसी भी दशक में हुई प्रगति से कहीं ज्यादा है। 

भाइयो और बहनो, 

आज दुनिया के देश एक दूसरे से जितना जुड़े हुए हैं उतना पहले कभी नहीं रहे। हमने अपनी विदेश नीति के जरिए यह कोशिश की है कि भारत को इस बात का पूरा फायदा मिले। दुनिया की बड़ी ताकतों से पिछले 9 सालों में हमारे संबंध लगातार सुधरे हैं। पूर्व और दक्षिण पूर्व Asia में स्थित दस ASEAN राष्ट्रों के साथ हमारी Look East Policy के अच्छे नतीजे सामने आए हैं, खासकर आर्थिक मामलों में। हमारी यह भी कोशिश रही है कि पड़ोसी देशों के साथ हमारी दोस्ती बढ़े। लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर होने के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी सरज़मीन और अपने नियंत्रण वाली ज़मीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किसी भी कार्रवाई के लिए न होने दे। 

राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति में सुधार हुआ है। 2012 में और इस साल कुछ राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा की चिंताजनक घटनाओं के बावजूद, पिछले 9 साल सांप्रदायिक सद्भाव की दृष्टि से अच्छे गुजरे हैं। आतंकवादी और नक्सली हिंसा में भी कमी आई है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में हमें लगातार सावधानी बरतने की ज़रूरत है। समय-समय पर हो रहे नक्सली हमलों को पूरी तरह रोकने में हम सफल नहीं हो पाए हैं। छत्तीसगढ़ में पिछली 25 मई को जो नक्सली हिंसा हुई वह भारत के लोकतंत्र पर एक सीधा हमला था। भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर हाल में हमारे जवानों पर कायरतापूर्ण हमला किया गया। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए हम हर मुमकिन कोशिश करेंगे। 

भाइयो और बहनो, 

सरकार के काम को ज़्यादा संवेदनशील, पारदर्शी, और ईमानदार बनाने के लिए हमने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें से मैं सिर्फ दो का ज़िक्र यहां करना चाहूंगा। 

RTI कानून के जरिए आम आदमी को अब सरकारी कामकाज के बारे में पहले से कहीं ज़्यादा जानकारी मिल रही है। इस कानून का इस्तेमाल एक बड़े पैमाने पर, हर स्तर पर हो रहा है। यह कानून अक्सर गड़बड़ी और भ्रष्टाचार को सामने लाता है और सुधार का रास्ता खोलता है। मुझे यकीन है कि आने वाले समय में RTI की वजह से सरकारी कामकाज में और सुधार आएगा । 

हमने संसद में लोकपाल बिल प्रस्तुत किया है। लोक सभा ने इसे pass कर दिया है और अब इस पर राज्य सभा विचार कर रही है। यह कानून हमारी राजनैतिक व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। 

भाइयो और बहनो, 

हमने पिछले दशक में एक लंबा सफर तय किया है। लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। बदलाव का जो सिलसिला हमने शुरू किया है उसे आने वाले वक्त में जारी रखा जाएगा। 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, तेज़ आर्थिक विकास हमारे देश के लिए बेहद ज़रूरी है। गरीबी दूर करना, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना और रोज़गार के नए-नए अवसर पैदा करना – यह सब तेज़ आर्थिक विकास के बगैर मुमकिन नहीं है। पिछले 9 साल में हमने आर्थिक विकास की जो औसत रफ्तार हासिल की है उससे हमारे देश की क्षमताओं का पता चलता है। लेकिन इस वक्त देश के आर्थिक विकास की दर में कमी आई है। हम इस कमी को दूर करने के लिए पूरी मेहनत से काम कर रहे हैं। 

उद्योगों के लिए सरकारी मंज़ूरियों की प्रक्रिया को तेज़ करने, देश में उद्योग और व्यापार के लिए बेहतर माहौल बनाने और निवेश को बढ़ाने के लिए हमने हाल ही में कई कदम उठाए हैं। बड़ी परियोजनाओं की मंजूरियों की प्रक्रिया में मदद करने के लिए एक विशेष cell की स्थापना की गई है। Cabinet Committee on Investment रुकी हुई परियोजनाओं की अड़चनें दूर करने का काम कर रही है। 

बिजली उत्पादन बढ़ाने के रास्ते में कोयले की आपूर्ति एक समस्या बन गई थी। इसको हमने काफी हद तक सुलझा लिया है। 

आने वाले महीनों में Infrastructure के क्षेत्र में बहुत सी बड़ी परियोजनाओं पर हम काम शुरू करने वाले हैं। इनमें 2 नए बंदरगाह, 8 नए हवाईअड्डे, नए Industrial Corridors और रेल परियोजनाएं शामिल हैं। 

Foreign Direct Investment को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में हमने कई क्षेत्रों में ऐसे निवेश की सीमा बढ़ाई है और इसकी प्रक्रिया को आसान बनाया है। 

निवेश बढ़ाने की इन कोशिशों के अच्छे नतीजे हमें अगले कुछ महीनों में साफ देखने को मिलेंगे। इससे आर्थिक विकास की रफ्तार तेज़ होगी, रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे और infrastructure में भी सुधार आएगा। 

भाइयो और बहनो, 

Food Security कानून बनने के बाद उसे प्रभावी ढंग से लागू करना हमारी प्राथमिकताओं में से एक रहेगी। इस दिशा में हमने राज्यों के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया है। Public Distribution System के Computerization के काम में तेज़ी लाई जाएगी। 

Mid-day-Meal Scheme में सुधार लाए जाएंगे। बच्चों को स्कूल में मिल रहा भोजन पौष्टिक होने के साथ-साथ साफ सुथरे ढंग से बना हुआ होना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए हम ठोस कदम उठाएंगे। 

Skill Development के क्षेत्र में शुरुआत में हम उतनी अच्छी प्रगति नहीं कर पाए जितनी चाहते थे, लेकिन अब इसमें तेज़ी आई है। हमने कुछ महीने पहले National Skill Development Authority का गठन किया है। हम जल्द ही एक नई योजना शुरू करेंगे जिसके तहत उन नौजवानों को लगभग 10 हज़ार रुपये की राशि दी जाएगी, जिन्होंने सफलतापूर्वक नई Skills हासिल की हैं। इस योजना से अगले 12 महीने में करीब 10 लाख नौजवानों को फायदा पहुंचेगा। 

अल्पसंख्यकों के लिए बनाए गए Multi-Sectoral Development Programme में हाल ही में सुधार लाए गए हैं। अब इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा। 

Minor Forest Produce के लिए खरीद मूल्य निर्धारित करने की स्कीम को मंजूरी दे दी गई है। इससे हमारे आदिवासी भाई-बहनों को लघु वन उपज के सही दाम मिलेंगे। इस योजना को हम जल्द-से-जल्द लागू करेंगे। 

आदिवासी भाई-बहनों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति और उनके स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर के बारे में सही जानकारी हासिल करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है। समिति की Report से हमें उनके लिए बेहतर योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। 

हम अपने देश में बहुत सी समस्याओं को बेहतर Technology के ज़रिए हल कर सकते हैं। इसकी एक मिसाल है आधार योजना। इस योजना के तहत इस साल के आख़िर तक पचास करोड़ लोगों को अपनी पहचान साबित करने का जरिया मिलेगा और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उनको सहूलियत पहुंचेगी। इसके ज़रिए हम करोड़ों लोगों को पहली बार बैंकों की सुविधाओं का लाभ दे पाएंगे। 

भाइयो और बहनो, 

एक आधुनिक, प्रगतिशील और Secular देश में तंग और सांप्रदायिक ख्यालों की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। ऐसी सोच हमारे समाज को बांटती है और हमारे लोकतंत्र को कमज़ोर करती है। हमें इसे रोकना होगा। हमें अपनी संस्कृति की उन परंपराओं को मज़बूत करना होगा, जो हमें अन्य विचारधाराओं के प्रति सहनशील होना और उनका सम्मान करना सिखाती हैं। मैं आज सभी राजनैतिक दलों, समाज के सभी वर्गों और आम जनता से इस दिशा में प्रयास करने की अपील करता हूँ । 

भाइयो और बहनो, 

कुछ देर पहले मैंने कहा था कि आज़ादी के बाद के हर दशक में भारत में बड़े परिवर्तन आये हैं। हमें आज यह सोचना है कि आने वाले दस सालों में हम किस तरह का परिवर्तन चाहते हैं। 

पिछले दस सालों में जैसी प्रगति हमने की है यदि हम उसे आगे भी जारी रखें तो वह वक्त दूर नहीं जब भारत को ग़रीबी, भूख, बीमारी और अशिक्षा से complete मुक्ति मिल जाएगी। हमारा भारत खुशहाल होगा और उसकी खुशहाली में सभी नागरिक बराबर के शरीक होंगे चाहे उनका धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा कुछ भी हो। 

इसके लिए हम सबको मिलकर देश में राजनैतिक स्थिरता, सामाजिक एकता और सुरक्षा का माहौल भी बनाना होगा। 

आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा भारत बनाने के लिए अपने आपको फिर से समर्पित करें। 

प्यारे बच्चों, अब आप मेरे साथ मिलकर तीन बार बोलिए… 

जय हिन्द जय हिन्द - जय हिन्द ।”  (PIB)   
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शरत/रतनानी/नवनीत/शाहबाज/सनोज/सतीश/लालमणी

Monday, August 5, 2013

देश में लगभग 47.50 लाख घरेलू कामगार

05-अगस्त-2013 19:56 IST
30 लाख महिलाएं काम कर रही हैं शहरी क्षेत्रों में 
सरकार ने बनाई घरेलू नौकरों संबंधी नीति 
Courtesy photo
श्रम और रोजगार राज्‍य मंत्री श्री कोडिकुन्‍नील सुरेश ने आज लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि राष्‍ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (एनएसएस) 2004-05 के अनुसार, देश में लगभग 47.50 लाख घरेलू कामगार है, जिनमें से 30 लाख महिलाएं शहरी क्षेत्रों में काम कर रही हैं। सरकार ने घरेलू कामगारों के संबंध में पहले ही एक नीति बना ली है। 

उन्‍होंने यह भी बताया कि केन्‍द्रीय सरकार ने असंगठित कामगारों जिनमें घरेलू कामगार भी शामिल हैं, की सामाजिक सुरक्षा के लिए असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 अधिनियमित किया है। इन घरेलू कामगारों पर न्‍यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948, कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923, समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 और अंतर्राज्यिक प्रवासी कर्मकार (आरईसीएस) अधिनियम, 1967 जैसे विभिन्‍न श्रम कानून भी लागू हैं। (PIB)
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वि.कासोटिया/महेश/गीता-5299

Friday, March 1, 2013

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना

01-मार्च-2013 15:53 IST
रिक्‍शा, ऑटो रिक्‍शा, टैक्‍सी चालक, सफाई कर्मी, कूड़ा बीनने वाले और खनन मजदूर योजना में शामिल अगले वित्‍त वर्ष 2013-14 के बजट प्रस्‍तावों में रिक्‍शा, ऑटो रिक्‍शा और टैक्‍सी चालकों सफाई कर्मियों, कूड़ा बीनने वालों और खनन मजदूरों को राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना के दायरे में शामिल करने का प्रस्‍ताव है। यह घोषणा वित्‍त मंत्री पी. चिदम्‍बरम ने कल लोकसभा में 2013-14 का आम बजट पेश करते हुए की। 

श्री चिदम्‍बरम ने कहा कि असंगठित क्षेत्र के लिए एक व्‍यापक और समन्वित सामाजिक सुरक्षा पैकेज से समाज के सबसे गरीब और कमजोर वर्गों को लाभ होगा। इस पैकेज में विकलांगों की सहायता, स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं, माताओं और शिशुओं के लिए सहायता और पेंशन के लाभ शामिल किए जाने चाहिएं। उन्‍होंने कहा कि विभिन्‍न मंत्रालय और विभाग इस समय आम आदमी बीमा योजना, जननी सुरक्षा बीमा योजना, राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना, जननी सुरक्षा योजना और इंदिरा गांधी मातृत्‍व सहयोग योजना चला रहे हैं। वित्‍त मंत्री ने विभिन्‍न मंत्रालयों और‍ विभागों के बीच समन्‍वय की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि एक व्‍यापक सामाजिक सुरक्षा पैकेज तैयार किया जा सके। 

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना, श्रम और रोजगार मंत्रालय की प्रायोगिक योजना है, जिसका इस समय गरीबी की रेखा से नीचे के 3 करोड़ 40 लाख परिवार लाभ उठा रहे हैं। (PIB)

मीणा/राजगोपाल/चन्‍द्रकला-765

Thursday, February 7, 2013

आम जनता से कंपनी के बारे में जानकारी आमंत्रित

06-फरवरी-2013 19:08 IST
वॉल-मार्ट जांच समिति ने लोगों से सूचनाएं मांगी 
सरकार द्वारा गठित वॉल-मार्ट जांच समिति ने आम जनता से कंपनी के बारे में जानकारी आमंत्रित की है। याद रहे कि वॉल-मार्ट कंपनी ने अमेरिका की सीनेट में ये खुलासा किया था कि उसने भारत में अपनी पैठ जमाने के लिए वर्ष 2008 से लगभग 125 करोड रुपये लॉबिंग में खर्च किए। इसके बाद सरकार ने संसद में ये आश्‍वासन दिया था कि एक अवकाश प्राप्‍त न्‍यायाधीश की जांच समिति द्वारा इस प्रकरण की जांच कराई जाएगी। समिति को 3 महीने में अपनी रिपोर्ट दे देनी है। 

अब सरकार ने आम जनता से जानकारी और दस्‍तावेजों को आमंत्रित किया है, जिन्‍हें 15 दिन के अंदर संयोजक, वॉल-मार्ट जांच समिति, कमरा नम्‍बर 208, विज्ञान भवन सौध, मौलाना आजाद रोड, नई दिल्‍ली-110011 को भेजा जा सकता है। इसके अलावा संबंधित जानकारी wmcommitte-mca@nic.in पर भी दी जा सकती है। (PIB)

वि.कासोटिया/अरूण/मलिक-466

Thursday, January 24, 2013

विशेष लेख//त्‍वरित अदालतें//*अनूप भटनागर

22-जनवरी-2013 20:17 IST
इस समय अधीनस्थ अदालतों की स्वीकृत संख्या करीब 18800

दिल्ली में गत वर्ष 16 दिसंबर को चलती बस में एक छात्रा से सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद से ही देश में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों से संबंधित मुकदमों की तेजी से सुनवाई के लिये त्वरित अदालतें गठित करने की मांग जोर पकड़ रही है।

इस घटना के बाद दिल्ली सरकार ने पांच त्वरित अदालतें गठित करने का फैसला किया और  इन अदालतों ने काम करना भी शुरू कर दिया है। दिल्ली सरकार ने 150 नये न्यायिक अधिकारियों और उनकी मदद के लिये 1085 सहयोगी कर्मचारियों की नियुक्ति का फैसला किया है।

महाराष्ट्र और पंजाब सहित कुछ अन्य राज्यों ने महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों, विशेष रूप से यौन उत्पीड़न और बलात्कार से संबंधित मुकदमों की तेजी से सुनवाई के लिये त्वरित अदालतें गठित करने की दिशा में कदम उठाये हैं। लेकिन कई राज्यों ने इस दिशा में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखायी है।

यही वजह है कि कई राज्यों में गैर सरकारी संगठनों और महिला संगठनों की ओर से बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़े मुकदमों की तेजी से सुनवाई के लिये बड़ी संख्या में त्वरित अदालतों के गठन की मांग लगातार जोड़ पकड़ रही है।

देश में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों की बढ़ती संख्या से निबटने के इरादे से ही केन्द्र सरकार ने हाल ही में सभी राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को 2000 नयी अधीनस्थ अदालतों के सृजन के बारे में पत्र भी लिखा है। इस समय अधीनस्थ अदालतों की स्वीकृत संख्या करीब 18800 है। 

इससे पहले, देश के प्रधान न्यायाधीश अल्‍तमस कबीर ने भी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को इस संबंध में पत्र लिखा था। प्रधान न्यायाधीश ने इस पत्र में राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन प्रणाली के तहत ‘नीति और कार्ययोजना‘ की ओर ध्यान आकर्षित करते हुये लिखा था कि 16 सितंबर, 2012 की स्थिति के अनुसार देश की अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के 3670 पद रिक्त थे।

प्रधान न्यायाधीश भी चाहते हैं कि महिलाओं के प्रति अपराधों से संबंधित मुकदमों की सुनवाई तेजी से हो। उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को लिखे पत्र में प्रधान न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय और जिला अदालतों के स्तर पर ऐसे अपराधों से संबंधित मुकदमों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर करने पर जोर भी दिया है।  एक अनुमान के अनुसार इस समय देश की अधीनस्थ अदालतों में करीब पौने तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं।

अधीनस्थ अदालतों में लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुये ही 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर केन्द्रीय सहायता से राज्यों में 1734 त्वरित अदालतें गठित की गयी थीं। केन्द्रीय सहायता से शुरू की गयीं त्वरित अदालतों ने सन 2000 से 2011 की अवधि में त्वरित अदालतों ने करीब 33 लाख मुकदमों का निबटारा भी किया था।

अधीनस्थ न्यायपालिका राज्य का विषय है।  इसलिए त्वरित न्याय प्रदान करने की प्रणाली को अधिक सुदृढ बनाने और अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों के अलावा नयी अदालतों के गठन और नये पदों के सृजन की दिशा में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से राज्य सरकार को ही कार्यवाही करनी है।

राज्यों ने केन्द्रीय सहायता मिलने तक त्वरित अदालतों को बनाये रखा लेकिन सहायता बंद होने के बाद उन्होंने इस मामले में अधिक दिलचस्पी नहीं ली। कुछ राज्यों ने केन्द्रीय सहायता बंद होने के बाद जहां त्वरित अदालतों को नियमित अदालतों में परिवर्तित कर दिया था जबकि कुछ अन्य राज्यों ने केन्द्रीय सहायता के बगैर ही त्वरित अदालतों को जारी रखा है।

अधीनस्थ अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या कम करने और जनता को सस्ता और शीघ्र न्याय प्रदान करने के लिये केन्द्र सरकार ने समय समय पर कई नये प्रयोग किये हैं। इन्हीं प्रयोगों के तहत जहां कुछ राज्यों में प्रातः कालीन तो कुछ राज्यों में सायंकालीन अदालतें शुरू की गयीं ।

इसी तरह देश की ग्रामीण जनता को छोटे छोटे विवादों के निबटारे के लिये ग्राम न्यायालयों की स्थापना की परिकल्पना की गयी। ग्राम न्यायालयों की स्थापना के लिये ग्राम न्यायालय कानून, 2008 के तहत इस समय मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा और कर्नाटक में 150 से अधिक ग्राम न्यायालय काम कर रहे हैं।

13वें वित्त आयोग ने 2010-15 की अवधि में राज्यों में न्यायिक सुधार के विभिन्न कार्यक्रमों के लिए पांच हजार करोड रूपए के अनुदान की सिफारिश की थी। केन्द्रीय सहायता से इस अवधि के दौरान राज्यों को कई महत्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं। इनमें राज्यों में अदालतों में उपलब्ध सुविधाओं के साथ ही अदालत के काम के घंटे बढ़ाने और पालियों में अदालतों की बैठक आयोजित करना, नियमित अदालतों का काम का बोझ कम करने के लिए लोक अदालतों को अधिक सक्रिय करना, विवादों के समाधान के लिए वैकल्पिक विवाद निबटान तंत्र को बढावा देना और प्रशिक्षण के माध्यम से न्यायिक अधिकारियों और लोक अभियोजकों की कार्य क्षमता में वृद्धि करना जैसे उपाय भी शामिल हैं।

पिछले कुछ दशकों में अदालतों में लंबित मुकदमों और नये मुकदमों की संख्या में काफी वृद्धि हुयी है लेकिन इस अनुपात में नयी अदालतों का गठन और न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों की संख्या में ही वृद्धि नहीं हो सकी है। इस तथ्य की ओर उच्चतम न्यायालय से समर्थित राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन प्रणाली ने भी ध्यान आकर्षित किया है। 

राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन प्रणाली के आंकडों के अनुसार पिछले तीन दशक में न्यायाधीशों और अदालतों की संख्या में वृद्धि की तुलना में मुकदमों की संख्या दुगुनी रफ्तार से बढी है। यदि न्यायिक प्रणाली का इसी रफ्तार से विस्तार होता रहा तो अगले तीन दशकों में मुकदमों की संख्या बढकर 15 करोड़ हो जायेगी और इनके निबटारे के लिये कम से कम 75 हजार न्यायाधीशों और अदालतों की आवश्‍यकता पड़ सकती है।

राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन प्रणाली के इस अनुमान के मद्देनजर जरूरी है कि अदालतों में लंबित मुकदमों के तेजी से निबटारे की दिशा में ठोस कदम उठाये जायें। अधीनस्थ अदालतों में लंबित मुकदमों का बोझ कम करने के लिये स्थाई रूप से त्वरित अदालतों का गठन एक ठोस विकल्प हो सकता है।

अधीनस्थ अदालतों में लंबित मुकदमों का बोझ कम करने के लिये अधिक उचित होगा कि राज्य सरकारें महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के मुकदमों की तेजी से सुनवाई की जिम्मेदारी विशेष त्वरित अदालतों को सौंपने के साथ ही जघन्य अपराधों से संबंधित दूसरे मुकदमों के शीघ्र निबटारे के लिये भी अधिक से अधिक त्वरित अदालतें गठित करें।

अधीनस्थ अदालतों और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर तेजी से नियुक्तियां करने के इरादे से जुलाई 2011 में एक विशेष अभियान शुरू किया गया था। इस अभियोग की संतोषजनक प्रगति को  देखते हुये इसकी अवधि बढ़ायी भी गयी थी।

न्यायपालिका में बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए केन्द्र सरकार की सहायता से एक योजना भी चल रही है जिसके अंतर्गत अदालतों की इमारतों साथ ही न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के लिए मकानों का निर्माण हो रहा है। इस योजना पर अमल के लिए केन्द्र सरकार और राज्यों को 75:25 के अनुपात में खर्च वहन करना है।

महिलाओं के प्रति अपराधों से संबंधित मुकदमों के तेजी से निबटारे के लिये त्वरित अदालतें गठित करने का निर्णय सराहनीय है लेकिन बेहतर होगा यदि लंबे समय से अदालतों में लंबित दूसरे आपराधिक मामलों के तेजी से निबटारे के लिये भी अधिक संख्या में त्वरित अदालतें गठित की जायें।

इस तरह की त्वरित अदालतों के गठन और उसके लिये न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में केन्द्र सरकार की सहायता से 2000 में शुरू की गयी त्वरित अदालतों की योजना पर हुआ क्रियान्वयन राज्यों के लिये काफी मददगार हो सकता है। इसके लिये आवश्‍यक है कि न्यायिक सुधारों के लिये केन्द्र सरकार की योजनाओ और प्रयासों को सफल बनाने में राज्य सरकारें अधिक सक्रिय भूमिका निभायें।

उम्मीद है कि उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को प्रधान न्यायाधीश के पत्र तथा केन्द्र सरकार की इस दिशा में पहल के बाद राज्यों में त्वरित अदालतें गठित करने का काम जोर पकड़ेगा। इस तरह के प्रयासों से जहां महिलाओं के प्रति अपराधों से संबंधित मुकदमों का तेजी से निबटारा होगा और अपराधियों को उनके कुकृत्य के लिये समय से कठोर सजा मिल सकेगी वहीं अधीनस्थ अदालतों में काम का बोझ कम होगा और नागरिकों को तेजी से न्याय भी सुलभ हो सकेगा।

* लेखक एक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

वि.कासोटिया/अनिल/सुजीत-26

Monday, December 24, 2012

श्रमिक कानूनों में सुधार पर संसदीय समिति की बैठक

24-दिसंबर-2012 15:36 IST
साथ-साथ बाल श्रम कानूनों का मामला भी जोर से उठाया  
श्रमिक कानूनों में व्‍यापक संशोधनों के लिए संसदीय सलाहकार समिति के सदस्‍यों ने सरकार से जोर देकर कहा है कि शिकायतों को समय पर दूर करने के साथ श्रमिक कानूनों को तेसी से और कारगर ढ़ग से लागू किया जाए। समिति की कल हुई बैठक में सदस्‍यों ने ठेका श्रमिक कानून में सुधार के साथ-साथ बाल श्रम कानूनों का मामला उठाया। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री श्री मल्लिकार्जुन खड्गे ने इस बैठक की अध्‍यक्षता की इन मामलों पर गंभीरता से विचार करने का आश्‍वासन दिलाया। 

श्री खड्गे ने कहा कि श्रम का विषय समवर्ती सूचि में शामिल है और केन्‍द्र और राज्‍य सरकार दोनों को इस संबंध में कानून बनाने का अधिकार है। उन्‍होंने सदस्‍यों को बताया कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान पारिश्रमिक भुगतान अधिनियम-1936 में संशोधन किए गए है, जिनके परिणामस्‍वरूप पारिश्रमिक का भुगतान 1100 रूपये मासिक से बढ़ाकर पहले 6500 समय प्रतिमाह और बाद में 10,000 रूपये मासिक कर दिया गया। 

इसके अलावा अन्‍य पिछड़ें वर्गों को आरक्षण उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से अप्रिंटिसेज अधिनियम-1961 में संशोधन किया गया है। यही नहीं बल्कि मातृत्‍व लाभ अधिनियम-1961 में भी संशोधन करके चिकित्‍सा बोनस की राशि 250 रूपये से बढ़ाकर 1000 रूपये कर दी गयी है। गजट अधिसूचना के माध्‍यम से इस राशि को 20000 रूपये तक करने के लिए केंद्रीय सरकार को अधिकृत किया गया है। इसके साथ ही श्रमिक मुआवजा कानून में भी संशोधन करके इसमें स्‍त्री-पुरूष के लिंग भेद को खत्‍म दिया गया हे। अब इस कानून के कर्मी मुआवजा कानून -1923 का शीर्षक दिया गया है। 

श्री खड्गे ने यह भी बताया कि उनके मंत्रालय ने श्रमिक राज्‍य बीमा कानून- 1948 में संशोधन करके इस योजना के अंतर्गत उपलबध कराए गए लाभों के स्‍तर में सुधार के साथ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल की सुविधा उपलब्‍ध कराये जाने के उद्देश्‍य से कर्मचारी राज्‍य बीमा संस्‍थान की ढांचागत सुविधाओं को सशक्‍त बनाया है। इसके साथ ही ग्रैच्‍युटी भुगतान अधिनियम-1972 में भी संशोधन करके ग्रैच्‍युटी भुगतान की राशि 3.5 लाख रूपये से बढ़ाकर 10 लाख रूपये कर दी गई है और अब इसमें शैक्षिक संस्‍थानों के अध्‍यापकों को भी शामिल किया गया है। 
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वि.कासोटिया/शिराजी/सुमन-6321

Wednesday, December 19, 2012

डाकघरों में कोर बैंकिंग

एटीएम बैंकिंग, इं‍टरनेट बैंकिंग, फोन बैंकिंग तथा मोबाइल बैंकिंग
संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में राज्‍यमंत्री डॉ. श्रीमती किल्‍ली क्रुपारानी ने आज लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि डाक विभाग सभी विभागीय डाकघरों में चरणबद्ध तरीके से कोर बैंकिंग सोल्‍यूशन (सी.बी.एस) का कार्यान्‍वयन कर रहा है। सीबीएस के कार्यान्‍वयन के उपरांत डाकघरों में एटीएम (स्‍वचालित गणक यंत्र) बैंकिंग, इं‍टरनेट बैंकिंग, फोन बैंकिंग तथा मोबाइल बैंकिंग जैसी सुविधायें प्रदान की जा सकेंगी। उन्‍होंने यह भी बताया कि सभी विभागीय डाकघरों में कोर बैंकिंग सोल्‍यूशन (सीबीएस) के कार्यान्‍वयन हेतु अंनतिम समय सीमा अप्रैल, 2014 निर्धारित की गई है। श्रीमती किल्‍ली क्रुपारानी सात सर्किलों (असम, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र, राजस्‍थान, तमिलनाडु, उत्‍तरप्रदेश तथा दिल्‍ली) के 122 डाकघरों को शुरू में पायलट चरण में कवर किया जाना है। (PIB)  19-दिसंबर-2012 15:57 IST

मीणा/शोभा/गीता-6214

Wednesday, November 21, 2012

कुपोषण के आंकड़े सतर्क करने वाले: राष्‍ट्रपति

राष्‍ट्रपति ने की कुपोषण के खिलाफ अभियान की शुरूआत 
कुपोषण के खिलाफ लड़ाई प्रत्‍येक परिवार और व्‍यक्ति तक पहुंचे: श्रीम‍ती कृष्‍णा तीरथ ने मीडिया से की खासतौर से अपील 
राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने कल कुपोषण के खिलाफ राष्‍ट्रव्‍यापी आईईसी अभियान की शुरूआत की। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने कुपोषण के खिलाफ अभियान चलाने की पहल की है। 

इस अवसर पर महिला और बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्‍णा तीरथ के अलावा मानव संसाधन विकास मंत्री श्री एम.एम. पल्‍लम राजू, संयुक्‍त राष्‍ट्र की अनेक एजेंसियों के प्रतिनिधि, अभिनेता श्री आमिर खान, गीतकार और पटकथा लेखक श्री प्रसून जोशी, सिविल सोसायटी के सदस्‍य और अनेक कार्यकर्ता मौजूद थे। 

कुपोषण के आंकड़ो को चिंता का विषय बताते हुए राष्‍ट्रपति ने कहा कि हमें ऐसे समय पर अधिकतम प्रयास करने चाहिए जब भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था मजबूत सकारात्‍मक विकास के पथ पर है। ये आंकड़े सतर्क करने वाले हैं और इस बात के महत्‍व को दर्शाते है कि कुपोषण के खिलाफ संगठित अभियान चलाने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा कि जब तक हम अपने बच्‍चों और उनकी माताओं के लिए अच्‍छा पोषण और स्‍वास्‍थ्‍य सुनिश्चित नहीं करेंगे तब तक हम निरंतर और समग्र विकास के लक्ष्‍य को हासिल नहीं कर सकते। हमें कुपोषण रोकने को सर्वोच्‍च प्राथमिकता देनी होगी।

राष्‍ट्रपति ने कहा कि इस अभियान को सफल बनाने के लिए कुपोषण के विभिन्‍न पहलुओं के बारे में लोगों में जागरूकता को बढ़ाना होगा और विभिन्‍न कार्यक्रमों के बारे में अलग से जागरूकता फैलानी होगी। उन्‍होंने उम्‍मीद जाहिर की कि इस अभियान से परिवारों, समुदायों और अन्‍य साझीदारों को न केवल कुपोषण को समझने में मदद मिलेगी बल्कि वे बेहतर जानकारी के साथ मिलकर कार्य भी कर सकेंगे। 

महिला और बाल विकास मंत्री श्रीम‍ती कृष्‍णा तीरथ ने कहा कि इस अभियान से समाज में महिलओं और बच्‍चों में अधिक संवेदनशीलता और व्‍यवहारिक बदलाव आयेगा। जिससे लोग अपनी जिम्‍मेदारियों को समझते हुए अपनी जिम्‍मेदारियों का निर्वहन कर सकेंगे। उन्‍होंने इच्‍छा जाहिर की कि कुपोषण के खिलाफ संघर्ष प्रत्‍येक आंगनवाड़ी केंद्र से लेकर प्रत्‍येक परिवार और प्रत्‍येक व्‍यक्ति तक पहुंचे। उन्‍होंने विश्‍वास व्‍यक्‍त किया कि जागरूकता अभियान में नीति में बदलाव पर जोर दिया जायेगा और इससे बच्‍चों, किशोरों, गर्भवती और स्‍तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण को रोकने और उसे खत्‍म करने में मदद मिलेगी। उन्‍होंने मीडिया से खासतौर से अपील की कि वे इस अभियान को आम आदमी तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाये। 

इस अभियान की शुरूआत पर श्री आमिर खान ने इसे जानकारी हासिल करने वाला अनुभव बताया। उन्‍होंने जोर देकर कहा कि ‘’अगर हमारे बच्‍चे स्‍वस्‍थ नहीं होंगे तो हम विकास के पथ पर आगे नहीं बढ़ पायेंगे’’। उन्‍होंने कहा कि आज यह जरूरी है कि देश कुपोषण से मुकाबला करे। उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि यह अभियान इतनी जागरूकता पैदा कर देगा कि भारत कुपोषण से मुक्‍त हो जायेगा।

श्री आमिर खान लोगों से जुड़ेंगे और कुपोषण के प्रभाव और इसे रोकने तथा कम करने के आसान तरीकों के बारे में जागरूकता फैलायेंगे। शिशुओं और छोटे बच्‍चों के खान-पान और उनकी देखभाल के बारे में 18 विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में टेलीविजन रेडियो और प्रिंट मीडिया पर विज्ञापन के रूप में संदेश दिये जायेगे। 

श्री प्रसून जोशी ने कहा कि इस अवधारणा को शुरू करना काफी कठिन था क्‍योंकि यह एक जटिल समस्‍या है जिसके बारे में आसान कदम उठाकर प्रचार करने की जरूरत है। 

यूनीसेफ के कंट्री हैड श्री लुई जोर्ज आर्सनॉल्‍ट ने यूनीसेफ की लम्‍बी भागीदारी की चर्चा की और सरकार के साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जाहिर की। उन्‍होंने कुपोषण से निपटने में सरकार के प्रयासों की सराहना की। (PIB)
 20-नवंबर-2012 12:08 IST

मीणा/कविता/सुमन – 5401